वो

वो मेरे हर ज़ख्म का मरहम हो जाता है,

 वो बिन शर्त के मेरा हमदम हो जाता है।

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अरसे से मुझसे रूबरू भी ना हुआ,

फिर भी आज मेरा दर्पण हो जाता है।

वो मेरे हर ज़ख्म का…

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मेरे मौन की गहराई को समझ लेता है,

और कभी मेरे क्रोध का मर्म हो जाता है।

वो मेरे हर ज़ख्म का…

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वैसे मुझे ईश्वर अल्लाह पर विश्वास नही,

पर धीरे-धीरे वो मेरा धरम हो जाता है।

वो मेरे हर ज़ख्म का…

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अस्पताल से हैं मेरी ज़िन्दगी के कुछ हिस्से,

पर उसकी मौजूदगी से मेरा हर दर्द कम हो जाता है।

वो मेरे हर ज़ख्म का…

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वैसे इस अकेलेपन से मुझे कोई शिकायत नहीं,

पर उसके साथ से ही मै और तुम हम हो जाता है।

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धुंध-सा है वो मेरे करीब,

फिर जाने क्यूं कभी मेरी असलियत और कभी भ्रम हो जाता है?

वो मेरे हर ज़ख्म का मरहम हो जाता है।।

                                   –वसुधा राजे द्विवेदी

क्यों?

बोल दुनिया मै क्यूं तेरे हिसाब से चलूं?

तु कहे तो जागूं और तेरे कहने पर ढलूं।

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मै जो हूं मुझे वही रहने दे,

जो कहना चाहूं मुझे वही कहने दे।

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मै अल्हड़ हूं, मुझे रहने के सलीके क्यूं सिखाती है?

खुद को सुधार लेने के लतीफे क्यूं सुनाती है?

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मेरे व्यक्तित्व पर कोई सवाल ना कर,

मेरा अस्तित्व अलग होने पर बवाल ना कर।

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हर कोई तेरे कहे रास्ते पर नही चल सकता,

हर कोई तेरे रीवाजों के अनुसार नही ढल सकता।

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मुझे इस बार मेरा रास्ता खुद चुनने दे,

जो सपने मै देख चुकी हूं अब उन्हे बुनने दे।

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ठोकर खाकर गिरने लगूँ तो गिरने दे मुझको,

गर मिट्टी मे मिलने लगूँ तो मिलने दे मुझको।

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शायद इससे ही मुझे संभलना आ जाए,

करने दे जतन मुझको जब तक हल ना आ जाए।

                        –वसुधा राजे द्विवेदी

उस राह पर

अपनी जिन्दगी के हर पल में उस शाम-सा ढलता रहा,

मै उस राह पर यूं ही बहुत देर तक चलता रहा।

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बेवजह ही खुद को ना जाने कितनी तकलीफें दे दी,

फिर उन्ही तकलीफों को चुपचाप निगलता रहा।

मै उस राह पर…

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जिसकी तलाश मे दर-दर भटक लिया,

वो कातिल भी वही निकला जो मेरे ज़हन मे पलता रहा।

मै उस राह पर…

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जाने कितना कुछ था जो मुझ संग घट गया,

फिर भी लोगों के बीच मे सूरज-सा निकलता रहा।

मै उस राह पर…

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कुछ बुरी आदतें सबको  लग जाती हैं,

तो मै किसी के इंतज़ार मे खुद को ही छलता रहा।

मै उस राह पर…

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दुनिया ने मुझे अक्सर संग-सा देखा,

पर अंदर ही अंदर मै टूटकर पिघलता रहा।

मै उस राह पर…

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दुनिया के नजरिए से मै इंसान न बन पाया,

तो दुनिया को देखकर ही अपना रंग बदलता रहा।

मै उस राह पर यूं बहुत देर तक चलता रहा।।

                                   –वसुधा राजे द्विवेदी

मेरा शहर

अज़ान से मुझे जगाता है मेरा शहर,

हर शाम को धुएं से ढक जाता है मेरा शहर।

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मेरे आने की खुशी मे लद जाते हैं आम पेड़ो पर,

ट्रेन की सीटी-सा मुझे बुलाता है मेरा शहर।

हर शाम को…

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यहाँ करवटें बदलकर ही कट जाती है रातें,

दादी की कहानियों से सुलाता है मेरा शहर।

हर शाम को….

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मेस के खाने से भूख नहीं मिटती मेरी,

मां के हाथों से खाना खिलाता है मेरा शहर।

हर शाम को…

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यहाँ के इत्रों से कुछ छुट जाने की गंध आती है,

अपनी सौंधी-सी खुशबू से मुझे भाता है मेरा शहर।

हर शाम को…..

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यहां फुरसत नही किसी को दो पल की,

हाथ जोड़कर कर हर शख्स से दिल मिलाता है मेरा शहर।

हर शाम को धुएं से ढक जाता है मेरा शहर।।

                                      –वसुधा राजे द्विवेदी

                 कविता

    किसी तकलीफ में जो मेरी कलम से छलक जाए

              वो कविता है,

      जिसके हर शब्द मे मेरी तस्वीर झलक जाए

             वो कविता है।

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    जो बिन दस्तक दिए मेरी जुबां पर चली आती है

             वो कविता है,

      जो मुझमे मुझसे ज्यादा खुद को ही पाती है

             वो कविता है।

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      जो मेरी तकलीफ को कम कर देती है

              वो कविता है,

       जो एक संग को भी नम कर देती है

              वो कविता है।

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        जो हर परिस्थिति मे मेरे साथ रहे 

                वो कविता है,

          जो शब्दों से ज्यादा एहसास रहे

               वो कविता है…..¡¡¡

                                    -वसुधा राजे द्विवेदी