– मंगलवार को दस साल की एक बलात्कार पीड़िता बच्ची ने एक बच्ची को जन्म दिया। बलात्कार बाहर के किसी शख़्स ने नहीं रिश्ते में जो मामा था, उसने किया था और एक बार नहीं कई बार। घरवालों को पता था या नहीं मैं नहीं कह सकती हूँ, जब उनको पता चला तो उन्होंने अबॉर्शन करवाना चाहा मगर ज्यूडिसियरी ने मना कर दिया। कानून बताया की फलाँ सप्ताह तक का भ्रूण हो चुका है, तो कानून अबॉर्शन की अनुमति नहीं देगा। तो बच्ची जन्म ले चुकी है, अभी इंटेसिव केयर में है और जब वो डिस्चार्ज होगी तो उसे किसी अनाथआश्रम में भेज दिया जायेगा। घरवाले उसे अपनाने को तैयार नहीं है। 
ये ख़बर पढ़ कर तो सबसे पहले जी भर कर देश की कानून-व्यवस्था को कोसने का मन हुआ। लगा की कुछ केस में तो इनको लिनिएंट होना चाहिए। सोचना चाहिए की जो खुद दस साल की बच्ची है, जिसे अपने शरीर का होश नहीं है, वो क्या संभालेगी एक और बच्चे को। 
दूसरी बात अगर उसका परिवार इतना स्ट्रांग और रसूख वाला रहता तो कोर्ट के बाप क्या, किसी को भी कानों-कान खबर नहीं लगती। इज़्ज़त पर आंच न आये इसलिए किसी प्राइवेट हॉस्पिटल में जा कर चुप-चाप एबॉर्शन करवा चुके होते। ये जितने क़ानून बने हैं न यकीन मानिये कहीं से भी निम्न-वर्गीय परिवार के भले के लिए नहीं बने हैं। पैसे वाले इनको क्या कहें, रं** के जैसे खरीद कर पॉकेट में लिए घूमते हैं और गरीब पर इनकी मलकियत चलती है। माफ़ कीजियेगा मेरे शब्दों के लिए। सच में मेरे मन में इस वक़्त घृणा के सिवाय और कोई फीलिंग नहीं है। 
अब बात आती है कि ऐसी घटनाओं के बाद, इन पीड़ितों का क्या होता है ? जो बच्चे बलात्कार की वजह से इस दुनिया में आते हैं क्या वह कभी समाज की मुख्यधारा से जुड़ पाते हैं? क्या बलात्कार की शिकार बच्चियाँ, लड़कियाँ और महिलाएँ हमारे बीच बिना किसी झिझक जी पाती हैं? क्या हम कभी उन्हें सामान्य नज़र से देख पाते हैं?
जवाब हम और आप दोनों ही जानते हैं। नहीं! वो और उनका परिवार एक समान्य ज़िंदगी हमारे समाज में कभी नहीं जी पाते हैं। वो अपना घर-बार यहाँ तक की शहर छोड़ कर दूसरे शहरों में जा कर नए सिरे से ज़िंदगी के सिरों को जोड़ने की कोशिश में लग जाते हैं। 
ऐसे में क्या समाज और साथ में सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं बनती की उन लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश की जाए ।ऐसे जो बच्चें हैं उन्हें अनाथाश्रम नहीं बल्कि एक घर मिलना चाहिए। 
अब सवाल ये है कि घर कैसे मिले? जहाँ बलात्कार पीड़िता का जीना मुश्किल है। उसका परिवार मुश्किल से उसका भरण-पोषण नहीं कर पा रहा वो उस नवजात के लिए क्या कर पायेगा। सोचने की जरुरत है इस विषय पर और गहराई से सोचने की जरुरत है। 
बलात्कारी तो जब पकड़ा जायेगा तब, उसको जो सज़ा मिलनी होगी मिलेगी। वैसे ये भी विडंबना है की ज्यादातर केस में बलात्कारियों को सज़ा तो क्या ही मिलेगी वो पकड़े तक नहीं जाते हैं। जो कुछ पकड़े गए वो सबूत के आभाव तो कभी पैसों के बल पर बाइज़्ज़त बड़ी हो जाते हैं। इसके लिए अलग से सख़्त कानून बनाने की जरुरत है। 
मीनव्हाइल इधर जो ज़िंदगी उस त्रासदी को झेलने के बाद भी चल रही है, उसके लिए सरकार मुआवज़ा और जो बच्चा इस दुनिया में अवांछित रूप से आ गया है उसके भविष्य के लिए मासिक तौर पर पैसे मिलने चाहिए। जिससे उसका भरण-पोषण हो सके। 
मगर इतना सोचने का वक़्त किसके पास। तरह-तरह के चुतियाप से सब का मनोरंजन हो रहा है। लोग भी मज़े ले रहें हैं। उनके लिए कौन सोचे? न्यूज़ चैनल वाले भी ब्रेकिंग न्यूज़ करके दो दिन तक खबर चलाते हैं, फिर TRP के चक्कर में नई ख़बर की तलाश में जुट जाते हैं। मैंने तो कभी नहीं देखा या सुना की बलात्कार होने के बाद उन लड़कियों की ज़िंदगी किस नर्क से गुज़रती है उस पर कोई ख़बर दिखाई गयी है या बताई गयी है। 
और फिर मिडिया को ही क्यों कोसा जाये। हम और आप क्या करते हैं? कभी किसी डरी-सहमी बच्ची को देख कर सिर पर हाथ फेरते हुए उससे उसके साथ जो घट रहा है उसके बारे में पूछा है। बाहर वालों को छोड़िये, कितने केसों में तो माँए ख़मोश रहती हैं और पिता बलात्कार करता है महीनों तक। माँ इज़्ज़त और आर्थिक-निर्भरता नहीं होने के कारन सब सहती है और बेटी को भी नर्क से गुजरने पर मज़बूर करती है। 
संवेदनहीनता की ये प्रकाष्ठा नहीं तो और क्या है ? हम सब को एकजुट हो कर इस विषय में सोचने और अपनी सोच को बदलने की जरुरत है। समाज का ये विकृत रूप आज नहीं तो कल हमारा और हमारे अपनों का शिकार करने से नहीं चुकेगा। 
हम किस चीज़ का इंतज़ार कर रहें हैं। अपने बलात्कार का । जरुरी नहीं की ये शारीरिक ही हो। ये ख़बरें ज़हनी तौर पर तो हमारा बलात्कार कर ही रही है। सोचियेगा। 

Copy pasted…

Advertisements

वो

वो मेरे हर ज़ख्म का मरहम हो जाता है,

 वो बिन शर्त के मेरा हमदम हो जाता है।

.

अरसे से मुझसे रूबरू भी ना हुआ,

फिर भी आज मेरा दर्पण हो जाता है।

वो मेरे हर ज़ख्म का…

.

मेरे मौन की गहराई को समझ लेता है,

और कभी मेरे क्रोध का मर्म हो जाता है।

वो मेरे हर ज़ख्म का…

.

वैसे मुझे ईश्वर अल्लाह पर विश्वास नही,

पर धीरे-धीरे वो मेरा धरम हो जाता है।

वो मेरे हर ज़ख्म का…

.

अस्पताल से हैं मेरी ज़िन्दगी के कुछ हिस्से,

पर उसकी मौजूदगी से मेरा हर दर्द कम हो जाता है।

वो मेरे हर ज़ख्म का…

.

वैसे इस अकेलेपन से मुझे कोई शिकायत नहीं,

पर उसके साथ से ही मै और तुम हम हो जाता है।

.
धुंध-सा है वो मेरे करीब,

फिर जाने क्यूं कभी मेरी असलियत और कभी भ्रम हो जाता है?

वो मेरे हर ज़ख्म का मरहम हो जाता है।।

                                   –वसुधा राजे द्विवेदी

क्यों?

बोल दुनिया मै क्यूं तेरे हिसाब से चलूं?

तु कहे तो जागूं और तेरे कहने पर ढलूं।

.

मै जो हूं मुझे वही रहने दे,

जो कहना चाहूं मुझे वही कहने दे।

.

मै अल्हड़ हूं, मुझे रहने के सलीके क्यूं सिखाती है?

खुद को सुधार लेने के लतीफे क्यूं सुनाती है?

.

मेरे व्यक्तित्व पर कोई सवाल ना कर,

मेरा अस्तित्व अलग होने पर बवाल ना कर।

.

हर कोई तेरे कहे रास्ते पर नही चल सकता,

हर कोई तेरे रीवाजों के अनुसार नही ढल सकता।

.

मुझे इस बार मेरा रास्ता खुद चुनने दे,

जो सपने मै देख चुकी हूं अब उन्हे बुनने दे।

 .

ठोकर खाकर गिरने लगूँ तो गिरने दे मुझको,

गर मिट्टी मे मिलने लगूँ तो मिलने दे मुझको।

.

शायद इससे ही मुझे संभलना आ जाए,

करने दे जतन मुझको जब तक हल ना आ जाए।

                        –वसुधा राजे द्विवेदी

उस राह पर

अपनी जिन्दगी के हर पल में उस शाम-सा ढलता रहा,

मै उस राह पर यूं ही बहुत देर तक चलता रहा।

.
बेवजह ही खुद को ना जाने कितनी तकलीफें दे दी,

फिर उन्ही तकलीफों को चुपचाप निगलता रहा।

मै उस राह पर…

.
जिसकी तलाश मे दर-दर भटक लिया,

वो कातिल भी वही निकला जो मेरे ज़हन मे पलता रहा।

मै उस राह पर…

.
जाने कितना कुछ था जो मुझ संग घट गया,

फिर भी लोगों के बीच मे सूरज-सा निकलता रहा।

मै उस राह पर…

.
कुछ बुरी आदतें सबको  लग जाती हैं,

तो मै किसी के इंतज़ार मे खुद को ही छलता रहा।

मै उस राह पर…

.
दुनिया ने मुझे अक्सर संग-सा देखा,

पर अंदर ही अंदर मै टूटकर पिघलता रहा।

मै उस राह पर…

.
दुनिया के नजरिए से मै इंसान न बन पाया,

तो दुनिया को देखकर ही अपना रंग बदलता रहा।

मै उस राह पर यूं बहुत देर तक चलता रहा।।

                                   –वसुधा राजे द्विवेदी

मेरा शहर

अज़ान से मुझे जगाता है मेरा शहर,

हर शाम को धुएं से ढक जाता है मेरा शहर।

.
मेरे आने की खुशी मे लद जाते हैं आम पेड़ो पर,

ट्रेन की सीटी-सा मुझे बुलाता है मेरा शहर।

हर शाम को…

.
यहाँ करवटें बदलकर ही कट जाती है रातें,

दादी की कहानियों से सुलाता है मेरा शहर।

हर शाम को….

.
मेस के खाने से भूख नहीं मिटती मेरी,

मां के हाथों से खाना खिलाता है मेरा शहर।

हर शाम को…

.
यहाँ के इत्रों से कुछ छुट जाने की गंध आती है,

अपनी सौंधी-सी खुशबू से मुझे भाता है मेरा शहर।

हर शाम को…..

.
यहां फुरसत नही किसी को दो पल की,

हाथ जोड़कर कर हर शख्स से दिल मिलाता है मेरा शहर।

हर शाम को धुएं से ढक जाता है मेरा शहर।।

                                      –वसुधा राजे द्विवेदी

                 कविता

    किसी तकलीफ में जो मेरी कलम से छलक जाए

              वो कविता है,

      जिसके हर शब्द मे मेरी तस्वीर झलक जाए

             वो कविता है।

    .

    जो बिन दस्तक दिए मेरी जुबां पर चली आती है

             वो कविता है,

      जो मुझमे मुझसे ज्यादा खुद को ही पाती है

             वो कविता है।

    .

      जो मेरी तकलीफ को कम कर देती है

              वो कविता है,

       जो एक संग को भी नम कर देती है

              वो कविता है।

    .

        जो हर परिस्थिति मे मेरे साथ रहे 

                वो कविता है,

          जो शब्दों से ज्यादा एहसास रहे

               वो कविता है…..¡¡¡

                                    -वसुधा राजे द्विवेदी